जो प्रभु दीनदयाला कहवा I
आरति हरन बेद जस गावा II
जपहि नामु जन आरत भारी I
मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी II
दीनदयाल बिरद संभारी I
हरहु नाथ मम संकट भारी II
( मिटटी का दिया और घी की बत्ती )
आरति हरन बेद जस गावा II
जपहि नामु जन आरत भारी I
मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी II
दीनदयाल बिरद संभारी I
हरहु नाथ मम संकट भारी II
( मिटटी का दिया और घी की बत्ती )