Monday, April 25, 2016

जीवन के संदेहों का निवारण

शोकस्थान शस्त्राणी हर्ष स्थानि शतानि च |
दिवसे दिवसे मूढ़माविशन्ति न पंडितम ||
अर्थात – मूर्ख मनुष्य को ही प्रतिदिन शोक के सहस्त्रों और हर्ष के सैकड़ो स्थान प्राप्त होते हैं, विद्वान पुरुष को नहीं |
नारद जी कहते हैं – तदनन्तर परम बुद्धिमान नंदभद्र बहूदक कुण्ड के तट पर वर्तमान कपिलेश्वर लिंग की पूजा करके प्रणामपूर्वक हाथ जोड़ कर भगवान् के आगे खड़े हुए | संसार के चरित्रों से उनके मन में दुःख हो गया था | इसलिए उन्होंने दुखी होकर यह गाथा गाई – यदि इस संसार की सृष्टि करने वाले भगवान् सदाशिव को मैं देख पाऊं, तो अनेक प्रश्नों के साथ तुरंत यह प्रश्न करूँगा कि भगवन ! क्या आपके उत्पन्न किये बिना ही यह अनेक रूपों में उपलब्ध होने वाला निरीह संसार भरता चला जा रहा है ? आप चेतन हैं, शुद्ध हैं और राग आदि दोषों से रहित हैं, तो भी आपने जो अखिल विश्व की सृष्टि की है, उसे आपने अपने सामान ही चेतन, विशुद्ध एवं राग आदी दोषों से रहित क्यों नहीं बनाया ? आप तो निर्वेर और समदर्शी हैं; फिर आपका बनाया हुआ यह जगत सुख दुःख और जन्म मरण आदि क्लेश क्यों पा रहा है ? संसार के ऐसे चरित्र से मैं मोहित हो गया हूँ | अतः अब किसी दुसरे स्थान नहीं जाऊंगा; भोजन भी नहीं करूँगा और पानी भी नहीं पीऊंगा | उपर्युक्त बातों का चिंतन करता हुआ मृत्युपर्यंत यही खड़ा रहूँगा | इस प्रकार विचार करते हुए नंदभद्र वहीँ खड़े रहे |
तत्पश्चात उसके चौथे दिन कोई सात वर्ष का बालक पीड़ा से पीड़ित होकर बहूदक के सुन्दर तट पर आया | वह बहुत ही दुर्बल तथा गलित कुष्ठ का रोगी था | उसे पग पग पर पीड़ा के मारे मूर्छा आ जाती थी | उस बालक ने बड़े क्लेश से अपने को संभाल कर नंदभद्र से कहा – ‘अहो ! आपके तो सभी अंग सुन्दर और स्वस्थ हैं, फिर भी आप दुखी क्यों है ?’ उसके पूछने पर नन्दभद्र ने अपने दुःख का सब कारण कह सुनाया | यह सब सुनकर बालक ने दुखी होकर कहा – ‘अहो ! इस बात से मुझे बड़ा भयंकर कष्ट हो रहा है कि विद्वान पुरुष भी अपने कर्तव्य को नहीं समझ पाते हैं | जिसका सम्पूर्ण शरीर इन्द्रियों से युक्त और स्वस्थ्य है, वह भी व्यर्थ मरने की इच्छा रखता है | जहां राजा खटवांग ने दो ही घडी में मोक्ष का मार्ग प्राप्त कर लिया, उसी भारतवर्ष को  आयु रहते कौन त्याग सकता है ? मैं तो अपने को ही दृड़ मानता हूँ; क्योंकि मेरे माता पिता कोई नहीं है, मुझमे चलने की शक्ति भी नहीं है, तथापि मैं मरना नहीं चाहता हूँ | धैर्यवान को सभी लाभ प्राप्त होते हैं; यह श्रुति का वचन सत्य है | आपको तो श्रुति के इस कथन से संतोष धारण करना ही उचित है; क्योंकि आपका यह शरीर अभी दृड़ है | यदि मेरा भी शरीर किसी प्रकार नीरोग हो जाय, तो मैं एक एक क्षण में वह सत्कर्म करू, जिसको एक एक युग में भोग जा सकता है | इन्द्रियां जिसके वश में हों और शरीर जिसका दृड़ हो, वह भी यदि साधन के सिवा और किसी वास्तु की इच्छा करे, तो उससे बढ़कर मूर्ख कौन हो सकता है ? मूर्ख मनुष्य को ही प्रतिदिन शोक के सहस्त्रों और हर्ष के सैकड़ों स्थान प्राप्त होते हैं, विद्वान् पुरुष को नहीं | जो ज्ञान के विरुद्ध हों, जिनमे नाना प्रकार के विनाशकारी विघ्न प्राप्त हों तथा जो मूल का ही उच्छेद कर डालने वाले हों, ऐसे कर्मों में आप जैसे बुद्धिमान पुरुषों की आसक्ति नहीं होती | आठ अंगों वाली जिस बुद्धि को सम्पूर्ण श्रेय की सिद्धि करने वाली बताया गया है, वह वेदों और स्मृतियों के अनुकूल चलने वाली निर्मल बुद्धि आपके भीतर मौजूद है | इसलिए आप जैसे लोग दुर्गम संकटों में तथा स्वजनों की विपत्तियों में भी शारीरिक और मानसिक दुःख से पीड़ित नहीं होते |
पंडितों की सी बुद्धि वाले विवेकी मनुष्य प्राप्त होने योग्य वस्तु की अभिलाषा नहीं करते, नष्ट हुई वस्तु के लिए शोक भी नहीं चाहते तथा आपत्तियों में मोहित नहीं होते हैं | सम्पूर्ण जगत मानसिक और शारीरिक दुखों से पीड़ित है | उन दोनों प्रकार के दुखों की शान्ति का उपाय विस्तारपूर्वक संक्षेप में ही सुनिए | रोग, अनिष्ट  वस्तु की प्राप्ति, परिश्रम तथा अभिष्ठ वस्तु के वियोग – यह चार कारणों से शारीरिक और मानसिक दुःख उत्पन्न होते हैं | अप्रिय का संयोग और प्रिय का वियोग ये दो प्रकार का मानसिक महाकष्ट बताया गया है | इस प्रकार यहाँ शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का दुःख बताया गया | जैसे लोहपिण्ड के तप जाने से उस पर रखा हुआ घड़े का जल भी गरम हो जाता है, उसी प्रकार मानसिक दुःख से शरीर को भी संताप होता है | अतः शीघ्र ही औषध आदि के द्वारा उचित प्रतिकार करने से व्याधि अर्थात शारीरिक  दुःख का शमन होता है और सर्वदा परित्याग करने से आधि अर्थात मानसिक दुःख का शमन होता है | इन दो क्रिया योगों से व्याधि और आधि   की शांति बताई गयी है | इसलिए जैसे जल से आग को बुझाया जाता है, उसी प्रकार ज्ञान से मानसिक दुःख को शांत करे | मानसिक दुःख के शांत होने पर मनुष्य का शारीरिक दुःख भी शांत हो जाता है | मन के दुःख की जड़ है स्नेह | स्नेह से ही प्राणी आसक्त होता है और दुःख पाता है | स्नेह से ही दुःख और स्नेह से ही भय उत्पन्न होते हैं | शोक, हर्ष तथा आवास – सब कुछ स्नेह से ही होता है | स्नेह से इन्द्रियराग तथा विषयराग का जन्म हुआ है, वे दोनों ही श्रेय के विरोधी हैं | इनमें पहला अर्थात इन्द्रियराग भारी माना गया है | इसलिए जो स्नेह या या आसक्ति का त्यागी, निर्वेर तथा निष्परिग्रह होता है, वह कभी दुखी नहीं होता | जो त्यागी नहीं है, वह इस संसार में बार बार जन्म मृत्यु को प्राप्त होता है | इस कारण मित्रों से तथा धनसंग्रह से होने वाले स्नेह में कभी लिप्त न हों और अपने शरीर के प्रति होने वाले स्नेह का ज्ञान द्वारा निवारण करें |
ज्ञानी, सिद्ध, शास्त्रज्ञ और जितात्मा – इनमें स्नेहजनित आसक्ति नहीं होती | ठीक वैसे ही, जैसे कमल के पत्तों में पानी नहीं सटता | राग के वशीभूत हुए पुरुष को काम अपनी ओर खींचता है, फिर उसके मन में भोग की इच्छा उत्पन्न होती है, उस इच्छा से ही तृष्णा या लोभ की उत्पत्ति होती है | तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ औ सदा उद्वेग में डालने वाली मानी गयी है | इसके द्वारा बहुत से अधर्म होते हैं | तृष्णा का रूप भी बड़ा भयंकर है | यह सबके मन को बींधने वाली है | खोटी बुद्धि वाले पुरुषों के द्वारा बड़ी कठिनाई से जिसका त्याग हो पाता है, जो इस शरीर के वृद्ध होने पर भी स्वयं बूढी नहीं होती तथा जो प्राणान्ताकारी रोग के सामान है, उस तृष्णा का त्याग करने वाले को ही सुख मिलता है | तृष्णा का आदि और अंत नहीं है | जैसे लोहे की मेल लोहे का नाश करती है, उसी प्रकार तृष्णा मनुष्यों के शरीर के भीतर रह कर उनका विनाश करती है |
नन्दभद्र बोले – शुद्ध बुद्धि वाले बालक ! यह क्या बात है कि पापी मनुष्य भी निरापद होकर स्त्री और धन के साथ आनंदमग्न देखे जाते हैं ?
बालक ने कहा – यह तो बहुत स्पष्ट है | जिन्होंने पूर्वजन्मो में तामसिक भाव से दान दिया है, उन्होंने इस जन्म में उसी दान का फल प्राप्त किया है | परन्तु तामसभाव से जो कर्म किया गया है, उसके प्रभाव से उन लोगों का धर्म में कभी अनुराग नहीं होता | ऐसे मनुष्य पुण्य-फल को भोग कर अपने तामसिक भाव के कारण नरक में ही जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है | इस संशय के विषय में मर्केंडेय जी ने पूर्वकाल में जो बात कही है, वह इस प्रकार सुनी जाती है – एक मनुष्य ऐसा है, जिसके लिए इस लोक में तो सुख का भोग सुलभ है, परन्तु परलोक में नहीं | दूसरा ऐसा है, जिसके लिए परलोक में सुख का भोग सुलभ है, किन्तु इस लोक में नहीं | तीसरा ऐसा है, जिसके लिए इस लोक में और परलोक में भी सुखभोग प्राप्त होता है और एक चौथे प्रकार का मनुष्य ऐसा है, जिसके लिए न तो इस लोक में सुख है और न परलोक में ही | जिसका पूर्व जन्म में किया हुआ पुण्य शेष है, उसी को वह भोगता है और नूतन पुण्य का उपार्जन नहीं करता, उस मंदबुद्धि एवं भाग्यहीन मानव को प्राप्त हुआ वह सुखभोग केवल इसी लोक के लिए बताया गया है | जिसका पूर्वजन्मोपार्जित पुण्य नहीं है, किन्तु वह तपस्या करके नूतन पुण्य का उपार्जन करता है, उस बुद्धिमान को परलोक में सदा ही सुख का भोग प्राप्त होता है | जिसका पहले का किया हुआ पुण्य भी वर्तमान है और तपस्या से नूतन पुण्य का भी उपार्जन हो रहा है, ऐसा बुद्धिमान कोई कोई ही होता है, जिसे इहलोक में और परलोक में भी सुख भोग प्राप्त होता है | जिसका पहले का भी पुण्य नहीं है और इस लोक में भी जो पुण्य का उपार्जन नही करता, ऐसे मनुष्यों का न इहलोक में सुख मिलता है न परलोक में ही | उस नराधम को धिक्कार है | हे महाभाग ! ऐसा जानकर सब कार्यों का त्याग करके भगवान् सदाशिव का भजन और वर्णधर्म का पालन कीजिये | इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्म नहीं है | जो अपने मनोरथों के नष्ट होने तथा प्राप्त होने पर भी शोक करता है अथवा जो अथवा जो भोगों से तृप्त नहीं होता, वह निश्चय ही दुसरे जन्म में बंधन में पड़ता है |
नन्दभद्र बोले – हे बालक ! आप बालरूप में उपस्थित होने पर भी वास्तव में बालक नहीं है, बड़े बुद्धिमान है, मैं आपको नमस्कार करता हूँ | मैं बड़े विस्मय में पड़ा हूँ और आप कौन हैं, यह यथार्थरूप से जानना चाहता हूँ | मैंने बहुत से वृद्ध पुरुषों का दर्शन और सत्संग लाभ किया है, किन्तु उन सबकी ऐसी बुद्धि न तो मैंने देखी है और न सुनी ही है | आपने तो मेरे जन्मभर के संदेह खेल खेल में ही नष्ट कर दिए | अतः आप कोई साधारण बालक नहीं है, यह मेरा निश्चित मत है |

ऐतरेय का वैराग्य ज्ञान दर्शन

अर्जुन ने पूछा – मुने ! ऐतरेय किसके पुत्र थे ? उनका निवास स्थान कहाँ था ? परम बुद्धिमान ऐतरेय ने किस प्रकार भगवान् के प्रसाद से सिद्धि प्राप्त की  ?
नारद जी ने कहा – कुन्तीनन्दन ! यहीं मेरे द्वारा स्थापित स्थान में जो हारित मुनि रहते थे, उन्ही के वंश में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्पन्न हुए, जो माँडूकि नाम से विख्यात थे | वे वेद-वेदांगों के पारंगत पंडित थे | उनके ‘इतरा’ नामवाली पत्नी थी, जो नारी के समस्त गुणों से सुशोभित थी | उसके गर्भ से जो पुत्र हुआ, उसी का नाम ‘ऐतरेय’ था | ऐतरेय बाल्यावस्था से ही निरंतर द्वादशाक्षर मंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का जप करता था, उसे पूर्व जन्म में ही इस मंत्र की शिक्षा मिली थी | वह न तो किसी की बात सुनता था और न स्वयं कुछ बोलता था और न अध्ययन ही करता था | इससे सबको निश्चय हो गया की यह बालक गूंगा है | पिता ने अनेक उपायों से उसको समझाया – बोध कराया, परन्तु उसने लौकिक व्यवहार में कभी मन नहीं लगाया | यह देख पिता ने भी यही निश्चय कर लिया की यह सर्वथा जड़ है | तब उन्होंने पिंगा नाम वाली दूसरी स्त्री से विवाह किया और उस से ४ पुत्र उत्पन्न किये जो वेद वेदांगों में विद्वान हुए |
ऐतरेय भी प्रतिदिन तीनो समय भगवान् वासुदेव के मंदिर में जाकर उस उत्तम मंत्र का जप करने लगे | वे दुसरे किसी कार्य में परिश्रम नहीं करते थे | एक दिन उनकी माता ने अपनी सौत के पुत्रों की योग्यता देख कर संतप्त चित्त हो अपने पुत्र से बोली – ‘अरे ! तू तो मुझे क्लेश देने के लिए ही पैदा हुआ ! मेरे जन्म और जीवन को धिक्कार है ! संसार में उस नारी का जन्म निश्चय ही व्यर्थ है, जो पति के द्वारा तिरस्कृत हो और जिसका पुत्र गुणवान न हो | वत्स ! मैं बड़े खोटे भाग्य वाली हूँ, अतः महिसागर संगम में डूब मरूंगी | मेरा मर जाना ही अच्छा है | जीवित रहने में मुझे क्या लाभ  है ? मेरे मर जाने पर तू भी भगवान् का महामौनी भक्त होकर दीर्घकाल तक आनंद भोगना |
नारद जी कहते हैं  – माता की यह बात सुनकर ऐतरेय ठठा कर हंस पड़े | वे बड़े धर्मज्ञ थे | उन्होंने दो घडी भगवान्  का ध्यान करके माता के चरणों में प्रणाम किया और कहा – माँ ! तुम झूठे मोह में पड़ी हुई हो | अज्ञान को ही ज्ञान मान बैठी हो | शुभे ! जो शोचनीय नहीं है, उसी के लिए तुम शोक करती हो और जो वास्तव में शोचनीय है उसके लिए तुम्हारे मन में तनिक भी शोक नहीं होता | यह संसार मिथ्या है | इसमें तुम इस शरीर के लिए क्यों चिंतित एवं मोहित हो रही हो | यह तो मूर्खों का काम है | तुम जैसे विदूषी स्त्रियों को ये शोभा नहीं देता | संसार में सार तत्व तो कुछ और ही है, किन्तु अज्ञान से मोहित मनुष्य किसी और ही असार वास्तु को सार समझते हैं | तुम इस मानव शरीर को यदि सार मानती हो तो लो, इसकी भी असारता सुनो | यह जो मानव शरीर है, यह गर्भ से लेकर मृत्युपर्यन्त सदा अत्यंत कष्टप्रद है का यह शरीर एक प्रकार का घर है | हड्डियों का समूह ही इसके भार को संभालने वाला खम्भा है | नाडीजालरुपी रस्सियों से ही इसे बाँधा गया
है | रक्त और मांसरुपी मिटटी से इसको लीपा गया है | विष्ठा और मूत्ररुपी द्रव्यों का यह संग्रह पात्र है | केश और रोमरुपी तृण से इसको छाया गया है | सुन्दर रंग की त्वचा से इसके ऊपर रंग किया गया है | मुख ही इसका प्रधान द्वार है | दो आँख, दो कान, और नाक के छिद्र – ये ही छह खिड़कियाँ है | दोनों ओठ ही इसके द्वार को ढकने वाले किवाड़ हैं | दांत ही अर्गला (किवाड़ बंद करने वाली कुण्डी) है | नाडी और पसीने ही नाली और जल प्रवाह है | यह सदा काल की मुखाग्नि में स्थित है | ऐसे इस देहरूपी गेह में जीव्  नाम वाला गृहस्थ निवास करता है | इस घर में त्रिगुणमयी प्रकृति ही उसकी पत्नी है तथा क्रोध, अहंकार, काम, इर्ष्या और लोभ आदि ही उक्त गृहस्थ की संतान हैं | हाय ! कितने कष्ट की बात है की जीव इस देह-गेह की मोह माया से मूढ़ होकर तदनुकूल बर्ताव करता है | उसका जिस जिस विषय में जैसे जैसे मोह होता है, वह सब बताता हूँ, सुनो ! जैसे पर्वत से झरने गिरते हैं, उसी प्रकार शरीर से भी कफ और मूत्र आदि बहते रहते हैं, उसी देह के लिए जीव मोहित होता है | विष्ठा और मूत्र से भरे हुए चर्मपात्र की भाँती यह शरीर समस्त अपवित्र वस्तुओं का भण्डार है और इसका एक प्रदेश (एक अंश) भी पवित्र नहीं है | अपने शरीर से निकले हुए मल-मूत्र आदि के जो प्रवाह हैं, उनका स्पर्श हो जाने पर मिटटी और जल से हाथ शुद्ध किया जाता है; तथापि उन्ही अपवित्र वस्तुओं के भण्डारस्वरुप इस देह से न जाने क्यों मनुष्य को वैराग्य नहीं होगा ? सुगन्धित तेल और जल आदि के द्वारा यत्नपूर्वक भली भाँती संस्कार (सफाई) करने पर भी यह शरीर अपनी स्वाभाविक अपवित्रता को नहीं छोड़ता है; ठीक उसी तरह, जैसे कुत्ते की टेढ़ी पूँछ को कितना ही सीधा कर लिया जाए, वह अपना टेढ़ापन नहीं छोड़ पाती | अपनी देह की अपवित्र गंध से जो मनुष्य विरक्त नहीं होता, उसे वैराग्य के लिए अन्य किस साधन का उपदेश दिया जाए ? दुर्गन्ध तथा मल-मूत्र लेप को दूर करने के लिए ही शारीरिक शुद्धि का विधान किया गया है | इन दोनों (गंध और लेप) का निवारण हो जाने के पश्चात आतंरिक भाव की शुद्धि होने से मनुष्य शुद्ध होता है | भाव शुद्धि ही सबसे बढ़कर पवित्रता है | वही सब कर्मों में प्रमाणभूत है | आलिंगन पत्नी का भी किया जाता है और पुत्री का भी, परन्तु दोनों में भाव का महान अंतर है | प्यारी पत्नी का आलिंगन किसी और भाव से किया जाता है एवं पुत्री का दुसरे भाव से | एक ही स्त्री के स्तनों को पुत्र दूसरे भाव से स्मरण करता है और पति दूसरे भाव से | अतः अपने चित्त को ही शुद्ध करना चाहिए | वाह्यशुद्धि के दूसरे दूसरे साधनों से क्या लेना है ? भावदृष्टी से जिसका अन्तःकरण अत्यंत शुद्ध है, वह स्वर्ग और मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है |
ज्ञानरूपी निर्मल जल तथा वैराग्यरूपी मृत्तिका से ही पुरुष के अविद्या एवं रागमय मल-मूत्र के लेप और दुर्गन्ध का शोधन होता है | इस प्रकार इस शरीर को स्वभावतः अशुद्ध माना गया है | जैसे केले के वृक्ष में केवल वल्कल ही सार है, उसी प्रकार इस देह में केवल त्वचा मात्र ही सार है, वास्तव में तो यह सर्वथा  निस्सार है | जो बुद्धिमान अपने शरीर को इस प्रकार दोषयुक्त जान कर उदासीन हो जाता है – उसकी ओर से अनुराग शिथिल कर लेता है – वही इस संसार बंधन से छूट कर निकल पाता है | किन्तु जो दृड़तापूर्वक इस शरीर को पकडे हुए रहता है – इसका मोह नहीं छोड़ता, वह संसार में ही पड़ा रह जाता है | इस प्रकार यह मानव जन्म लोगों के अज्ञानदोष से तथा नाना प्रकार के कर्मशात दुःखस्वरुप और महान कष्टप्रद बताया गया है | जैसे बड़े भारी पर्वत से दबा हुआ कोई प्राणी बड़े कष्ट से पीड़ित रहता है, उसी प्रकार गर्भ की झिल्ली में बंधा हुआ मनुष्य महान कष्ट से वहां ठहर पाता है | जैसे समद्र में गिरा हुआ कोई मनुष्य अत्यंत व्याकुल हो कर बड़े भारी दुःख से घिर जाता है, उसी प्रकार गर्भगत जल से भीगे हुए अंगों वाला गर्भस्थ शिशु अत्यंत व्याकुल रहता है | जैसे किसी को लोहे के घड़े में रखकर आग में पकाया जाता है, वैसे ही गर्भ रुपी घाट में डाला हुआ जीव जठरानल की आंच से पकता रहता है | यदि आग के समान दहकती हुई सुइयों से किसी को निरंतर छेदा जाए तो उसे कितनी पीड़ा हो सकती है, उस से आठ गुनी पीड़ा गर्भ में भोगनी पड़ती है |
इस प्रकार स्थावर जंगम सभी प्राणियों को अपने अपने गर्भ के अनुरूप यह महान गर्भ दुःख प्राप्त होता है; ऐसा कहा गया है |
गर्भ में स्थित होने पर सभी को अपने पूर्व जन्मों का स्मरण हो आता है | उस समय जीव इस प्रकार सोचता है – ” अहो ! मैं मरकर पुनः उत्पन्न हुआ और उत्पन्न हो कर पुनः मृत्यु को प्राप्त हुआ | जन्म से लेकर मैंने सहस्त्रों योनियों का दर्शन किया है | इस समय जन्म धारण करते ही मेरे पूर्वसंस्कार जाग उठे हैं;  अतः अब मैं ऐसे कल्याणकारी साधन का अनुष्ठान करूँगा, जिस से पुनः मेरा गर्भवास न हो | संसार बंधन को दूर करने वाले भगवदीय तत्त्वज्ञान का मैं चिंतन करूँगा | ” इस प्रकार उस दुःख से छूटने के उपाय पर विचार करता हुआ गर्भस्थ जीव चिंतामय रहता है | जब उसका जन्म होने लगता है, उस समय तो उसे गर्भ की अपेक्षा भी कोटिगुना अधिक दुःख होता है | गर्भवास के समय जो बुद्धि जागृत रहती है, वह जन्म हो जाने पर नष्ट हो जाती है | बाहर की हवा लगते ही मूढ़ता आ जाती है | मोहग्रस्त होने पर शीघ्र ही उसकी स्मरण शक्ति का नाश हो जाता है | स्मरण शक्ति नष्ट होने पर पूर्वकर्मवशात जीव का पुनः उसी जन्म (के शरीर आदि ) में अनुराग हो जाता है | इस प्रकार राग और मोह के वशीभूत हुआ वह संसार में न करने योग्य पापादि कर्मों में लग जाता है | उनमें फंसकर न तो वह अपने को जानता है, न दूसरों को जानता है और न किसी देवता को ही कुछ समझता है | अपने परम कल्याण की बात तक नहीं सुनता | आँख रहते हुए भी नहीं देखता | समतल मार्ग पर धीरे धीरे चलते हुए भी वह पग पग पर लड़खड़ाने लगता है | विद्वानों के समझाने पर भी, बुद्धि रहते हुए भी वह नहीं समझ पाता, इसलिए राग और मोह के वशीभूत होकर संसार में क्लेश उठाता रहता है | जन्म लेने पर गर्भ काल में जागृत हुई पूर्व जन्म की स्मृति अथवा गर्भ के दुखों की स्मृति नहीं रहती, इसलिए महर्षियों ने  गर्भ दुःख का निरूपण करने के लिए शास्त्रों का प्रतिपादन किया है | वे शास्त्र स्वर्ग और मोक्ष के उत्तम साधन हैं | सब कार्यों और प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले इस शास्त्रज्ञान के रहते हुए भी लोग उस से अपने कल्याण का साधन नहीं करते | यह बड़ी अद्भुत बात है |
बाल्यावस्था में इन्द्रियों की वृत्तियाँ अव्यक्त रहती हैं, इसलिए जीव उस समय के महान दुःख को बताने की इच्छा होने पर भी बता नहीं सकता और न उस दुःख के निवारण के लिए कुछ कर ही सकता है | फिर जब दांत उठने लगते हैं तब उसे महान कष्ट भोगना पड़ता है | मूल रोग (सर दर्द), नाना प्रकार के बाल रोग तथा पूतना आदि बालग्रह आदि से भी बालक को बड़ी पीड़ा होती है | भूख प्यास की पीड़ा से उसके सब अंग व्याकुल रहते हैं तथा वह कभी खाट पर पड़ा हुआ रोता रहता है | इसके बाद जब वह कुछ बड़ा हो जाता है, तब अक्षरों के अध्ययन आदि से और गुरु के अनुशासन से उसको महान दुःख होता है |
युवावस्था में रागोनमत्त पुरुष की सम्पूर्ण इन्द्रिय-वृत्तियाँ काम तथा राग की पीड़ा से सदा मतवाली रहती हैं | अतः उसे भी कहाँ से सुख प्राप्त हो सकता है | मोहवश पुरुष को यदि कहीं अनुराग हो जाता है तो ईर्ष्या के कारण उसे बड़ा भारी दुःख होता है | जो उन्मत्त और क्रोधी है उसका कहीं भी राग होना केवल दुःख का ही कारण है | रात में कामाग्निजनित खेद से पुरुष को नींद नहीं आती | दिन में भी द्रव्योपार्जन की चिंता लगी रहने के कारण उसे सुख नहीं मिल सकता | स्त्रियाँ सब दोषों का आश्रय है; यह बात भली भाँती जान लेने पर भी जो लोग उनमें मैथुन से सुख मानते हैं, उनका वह सुख मल-मूत्र त्याग के सदृश ही माना गया है | सम्मान अपमान से, प्रियजनों का संयोग-वियोग से  तथा जवानी वृद्धावस्था से ग्रस्त है | निर्विघ्न सुख कहाँ है ?
युवावस्था का शरीर एक दिन जरा अवस्था से जर्जर कर दिया जाने पर सम्पूर्ण कार्यों के लिए असमर्थ हो जाता है | उसके बदन में झुर्रियां पड़ जाती हैं, सर के बाल सफेद हो जाते हैं और शरीर बहुत ढीला ढाला हो जाता है | स्त्री और पुरुष का वही रूप, जो जवानी के दिनों में एक दूसरे का आधार था, जराग्रस्त हो जाने पर दोनों में से किसी को भी प्रिय नहीं लगता | बुढ़ापे में दबा हुआ पुरुष असमर्थ होने के कारण पत्नी पुत्र आदि बंधू बांधवों तथा दुराचारी सेवकों द्वारा भी अपमानित होता है | वृद्धावस्था में रोगातुर पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन करने में असमर्थ हो जाता है, इसलिए युवावस्था में ही धर्मं का आचरण करना चाहिए |
वात, पित्त और कफ़ की विषमता ही व्याधि कहलाती है | इस शरीर को वात आदि का समूह बताया गया है | इसलिए अपना यह  शरीर व्याधिमय है,; ऐसा जानना चाहिए | इस शरीर में अनेक प्रकार के रोगों द्वारा बहुतेरे दुःख प्रवेश कर जाते हैं | उनका पता अपने आपको भी नहीं चलता है फिर दूसरों को तो लग ही कैसे सकता है | इस देह में एक सौ एक व्याधियां स्थित हैं | इनमें से एक व्याधि तो काल के साथ रहती हैं और शेष आगंतुक मानी गयी है | जो आगंतुक बताई गयी है, वे तो दवा करने से तथा जप, होम और दान से शांत हो जाती हैं; परन्तु मृत्युरूपी व्याधि कभी शांत नहीं होती | नाना प्रकार की व्याधियां, सर्प आदि प्राणी, विष एवं अभिचार (पुरश्चरण) – वे सब देहधारियों के मृत्यु के द्वार बताये गए हैं | यदि जीव का काल आ पहुंचा है, तो सर्प और रोग आदि से पीड़ित होने पर उसे धन्वन्तरि भी जीवित नहीं रख सकते | काल से पीड़ित मनुष्य को औषध, तपस्या, दान, मित्र तथा बंधू बांधव – कोई भी बचा नहीं सकते | रसायन, तपस्या, जरा, योग, सिद्ध-महात्मा तथा पंडित – ये सब मिलकर भी कालजनित मृत्यु को नहीं टाल सकते | समस्त प्राणियों के लिए मृत्यु के समान कोई दुःख नहीं है, मृत्यु के समान कोई भय नहीं है, मृत्यु के समान कोई त्रास नहीं है | सती भार्या, उत्तम पुत्र, श्रेष्ट मित्र, राज्य, ऐश्वर्य और सुख – ये सभी स्नेहपाश में बंधे हुए हैं | मृत्यु इन सब का उच्छेद कर डालती है | माँ ! क्या तुम नहीं देखती हो की हजारों मनुष्यों में से पांच भी शायद ऐसे होंगे जो पूरे सौ वर्ष तक जीने वाले हो | कोई ही कोई अस्सी वर्ष और सत्तर वर्ष की अवस्था में मरते हैं | प्रायः साथ वर्ष तक की ही लोगों की परमायु हो गई है; किन्तु वह भी सबके लिए निश्चित नहीं है | जिस देहधारी को अपने  पूर्वकर्मानुसार जितनी आयु प्राप्त होती है, उसका आधा भाग तो मृत्यु रूपिणी रात्रि हर लेती है | बाल्यावस्था, अबोधावस्था और बृद्धावस्था के द्वारा बीस वर्ष और व्यतीत हो जाते हैं – जो धर्म, अर्थ और काम – किसी के भी उपयोग में नहीं आते | शेष आयु का आधा भाग मनुष्य के आने वाले बहुत से भय और अनेक प्रकार के रोग और शोक आदि हर लेते हैं | इन सबसे जो शेष रह जाता है, वही मनुष्य का जीवन है |
इस जीवन की समाप्ति होने पर मनुष्य अत्यंत भयंकर मृत्यु को प्राप्त होता है | मृत्यु के बाद वह पुनः करोड़ों योनियों में जन्म ग्रहण करता है | कर्मों की गणना के अनुसार देह भेद से जो जीव एक शरीर से वियोग होता है, उसे ‘मृत्यु’ नाम दिया गया है, वास्तव में उस से जीव का विनाश नहीं होता | मृत्यु के समय महान मोह को प्राप्त हुए जीव के मर्म स्थान जब वेदीर्ण होने लगते हैं, उस दशा में उसे जो बड़ा भारी कष्ट भोगना पड़ता है, उसकी इस संसार में कहीं कोई उपमा नहीं है | जैसे सांप मेंढक को निगल जाता है, उसी प्रकार मृत्यु जब मनुष्य को निगलने लगती है, उस समय वह हा तात ! हा मातः ! हा कान्ते ! इत्यादि रूप से पुकारता हुआ अत्यंत दुखी हो होकर रोता है | भाई बांधवों से साथ छूट रहा है, प्रेमीजन उसे चारों ओर से घेर कर खड़े हैं | वह सूखते हुए मुख से गरम गरम सांस खींचता है | चारपाई पर चारों ओर बार बार करवट बदलता है | पीड़ा से मोहित होकर बड़े वेग से इधर उधर हाथ फेंकता है | उसके वस्त्र खुल गए हैं, उसकी लज्जा छूट चुकी है, विष्ठा ओर मूत्र में सना हुआ है | कंठ, ओष्ठ ओर तालू सूख जाने के कारण बार बार पानी मांगता है | अपने धन वैभव के लिए इस बात की चिंता करता है की मेरे मर जाने पर ये किसके हाथ में पड़ेंगे | पुनः कालपाश से खींचे जाने पर उसका गला घुरघुराने लगता है ओर पार्श्वर्ती लोगों के देखते देखते मृत्यु को प्राप्त हो जाता है | जैसे तृणजलौका जल में बहते हुए तिनके के अंत तक पहुँच कर जब दूसरा तिनका थाम लेती है, तब पहले को छोड़ देती है | उसी प्रकार जीव एक देह से दूसरी देह में क्रमशः प्रवेश करता है | भावी शरीर में अंशतः प्रवेश करके पूर्व शरीर को त्याग करता है |
विवेकी पुरुष के लिए किसी से कुछ माँगना मृत्यु से भी अधिक दुखदायी होता है | मृत्यु का दुःख तो क्षणभर में समाप्त हो जाता है, परन्तु याचनाजनित दुःख का कभी अंत नहीं होता | मैंने तो इस समय यह अनुभव किया है की मृत मनुष्य जीवित रहकर याचना करने की अपेक्षा श्रेष्ठ है; क्योंकि अब वह फिर दूसरे किसी के सामने हाथ नहीं फैला सकता | तृष्णा ही लघुता का कारण है | आदि में दुःख है, मध्य में दुःख है तथा अंत में भी दारुण दुःख प्राप्त होता है | दुखों की यह परंपरा समस्त प्राणियों को स्वभावतः प्राप्त होती है | क्षुधा को सब रोगों से महान रोग माना गया है | वह अन्नरुपी औषधि का लेप करने से कुछ क्षणों के लिए शांत हो जाती है | ( यदि कहें की धन धान्य संपन्न राजा सुखी होंगे तो यह भी ठीक नहीं) राजा को केवल यह अभिमान ही होता है की मेरे घर में इतना वैभव शोभा पा रहा है | वास्तव में तो उनका सारा आभरण भाररूप है, समस्त आलेपन-द्रव्य मलमात्र हैं, सम्पूर्ण संगीत राग प्रलापमात्र है तथा नृत्य आदि भी पागलों की सी  चेष्टा है | विचार दृष्टी से देखने पर इन राज्यभोगों के द्वारा  राजाओं को सुख कहाँ प्राप्त मिलता है ? क्योंकि वे लोग तो एक दूसरे को जीतने के लिए सदा ही चिंतित रहते हैं | प्रायः राज्यलक्ष्मी के मद से उत्पन्न होने के कारण नहुष आदि महाराज स्वर्ग का साम्राज्य पाकर भी वहां से नीचे गिर गए हैं | राजलक्ष्मी अथवा धनऐश्वर्य से भला कौन सुख पाता है ?
मनुष्य स्वर्ग लोक में जो पुण्य फल भोगते हैं, वह अपने मूलधन को गवा कर ही भोगते हैं; क्योंकि वहां वे दूसरा नवीन कर्म नहीं कर सकते | यही स्वर्ग में अत्यंत भयंकर दोष है | जैसे वृक्ष की जड़ काट देने पर वह विवश होकर पृथ्वी पर गिर पड़ता है, उसी प्रकार पुण्यरूपी मूल का क्षय हो जाने पर स्वर्गवासी जीव पुनः पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं | इस तरह विचार पूर्वक देखा जाए तो स्वर्ग में भी देवताओं को कोई सुख नहीं है | नर्क में गए हुए पापी जीवों का दुःख तो प्रसिद्ध है – उनका क्या वर्णन किया जाये | स्थावर योनि में पड़े हुए जीवों को भी बहुत दुःख भोगने पड़ते हैं | दावानल से जलना, पाला पड़ने से गलना, धूप ओर हवा से सूखना, कुल्हाड़ी से काटा जाना, उनके वल्कलों (छिलकों) का उतरा जाना, प्रचंड आंधी के वेग से पत्तों, डालियों और फलों का गिराया जाना तथा हाथियों और अन्य जंगली जंतुओं द्वारा कुचला जाना आदि उनके लिए महान दुःख हैं |
सर्पों और बिच्छुओं को प्यास और भूख का कष्ट रहता है, उन्हें क्रोध का भी दारुण दुःख सहन करना पड़ता है | संसार में प्रायः दुष्ट सांप बिच्छुओं को मारा  जाता है, उन्हें जाल में फंसा कर बंद रखा जाता है  | माता जी ! इस प्रकार उस योंनी के जीवों को बारम्बार कष्ट उठाना पड़ता है | कीड़े आदि का अकस्मात् जन्म होता है और अचानक ही उनकी मौत भी हो जाती है | अतः उनका दुःख भी कम नहीं है | मृगों और पक्षियों को वर्षा, सर्दी और धूप का महान कष्ट तो है ही, भूख प्यास के भारी दुःख से भी मृग सदा संत्रस्त रहते हैं | पशु समूह के जो दुःख हैं, उन्हें भी सुन लो | भूख प्यास तथा सर्दी गर्मी आदि का कष्ट सहना, मारा जाना, बंधन में डाला जाना और डंडे आदि से पीटा जाना, नाक का छेदा जाना, चाबुक और अंकुश की मार पड़ना आदि उनके महान क्लेश हैं | इनके अतिरिक्त बोझ ढोने का भी उन्हें  बड़ा भारी कष्ट है | कार्य की शिक्षा देते समय भी उन्हें मारा पीटा जाता है, फिर युद्ध आदि की भी पीड़ा भी सहनी पड़ती है | अपने झुण्ड से जो उनका वियोग होता  है और वे वन से जो अन्यत्र लाये जाते हैं – यह सब कष्ट अलग हैं |
दुर्भिक्ष, दुर्भाग्य का प्रकोप, मूर्खता, दरिद्रता, नीच उंच का भय, मृत्यु, राष्ट्रविप्लव (एक राज्य का नाश करके दुसरे के स्थापना करना ), पारस्परिक अपमान का दुःख, आपस में एक दूसरे से धन वैभव या मान प्रतिष्ठा में बढ़ जाने से कष्ट, अपनी प्रभुता का सदा स्थिर न होना, ऊंचे चढ़े हुए लोगों का नीचे गिराया जाना इत्यादि महान दुखों से यह सम्पूर्ण चराचर जगत व्याप्त है | जैसे इस कंधे का भार उस कंधे पर कर देने को मनुष्य विश्राम समझता है, उसी प्रकार इस लोक में एक दुःख दुसरे दुःख से ही शांत होता है | अतः एक दूसरे से ऊँची स्थिति में स्थित होते हुए इस सम्पूर्ण जगत को दुखों से भरा हुआ जान कर उसकी ओर से अत्यंत उद्विग्न हो जाना चाहिए | उद्वेग से वैराग्य होता है, वैराग्य से ज्ञान प्रकट होता है तथा ज्ञान से परमात्मा विष्णु को जानकार मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है |
माँ ! जैसे कौओं के अपवित्र स्थान में विशुद्ध राजहंस नहीं रह सकता, उसी प्रकार ऐसे दुखमय संसार में मैं तो कभी नहीं रम सकता | मैया ! जहाँ रहकर मैं बिना किसी विघ्नबाधा के आनंदपूर्वक रह सकता हूँ, वह स्थान भी बताता हूँ, सुनो ! अविद्यारूपी वन तो बड़ा भयंकर है | उसमें नाना प्रकार के कर्ममय वृक्ष खड़े हैं | वहां संकल्पों के डांस और मच्छर बहुत हैं | शोक ओर हर्ष ही वहां की सर्दी और धूप हैं | उस वन में मोह का घना अन्धकार छाया रहता है | वहां लोभरूपी सांप और बिच्छू रहते हैं | विषयों के अनेक मार्गों से वह प्रदेश व्याप्त है | काम और क्रोधरूपी बधिक तथा लुटेरे उसमें सदा डेरा डाले रहते हैं | उस महादुखमय विशाल वन को लांघ कर अब मैं एक ऐसे महान विपिन में प्रवेश कर चुका हूँ, जहाँ पहुच कर उसके तत्व को जानने वाले ज्ञानी पुरुष न शोक करते हैं, न हर्ष | यहाँ किसी से भय नहीं है, किसी को भी भय नहीं है | उस विद्या रुपी वनमें साथ बड़े भरी वृक्ष हैं | वहां सात ही पर्वत हैं, जिन्होंने तीनो लोको को धारण कर रखा है | सात ही कुण्ड हैं और सात ही नदियाँ हैं, जो सदा ब्रह्मरूप जल बहाया करती है | तेज, अभयदान, अद्रोह, कौशल, अचपलता, अक्रोध और प्रिय वचन बोलना – ये ही सात पर्वत विद्यावान में स्थित हैं | दृण निश्चय, सबके साथ समता, मन और इन्द्रियों में संयम, गुणसंचय, ममता का अभाव, तपस्या तथा संतोष – ये सात कुण्ड हैं | भगवान् के गुणों का विशेष ज्ञान होने से जो उनके प्रति भक्ति होती है, वह विद्या वन की पहली नदी है | वैराग्य दूसरी, ममता का त्याग तीसरी, भगवदाराधन चौथी, भाग्वादर्पण पांचवी, ब्रहएकत्व बोध छठी तथा सिद्धि सातवी नदी है | ये ही साथ नदियाँ वहां स्थित बताई गई हैं | बैकुंठ धाम के निकट इन सातों नदियों का संगम होता है | जो आत्मतृप्त, शांत तथा जितेन्द्रिय होते हैं, वे ही महात्मा उस मार्ग से परात्पर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं | कोई श्रेष्ठ ज्ञानीजन उन वृक्षों को प्राप्त करता है, कोई पर्वतों को,कोई कुण्डों को और कोई उन सात सरिताओं को ही प्राप्त होता है |
माँ ! मैं ग्रहण किये हुए व्रत को धारण करने की इच्छा रख कर ब्रह्मचर्य का आचरण करता हूँ | इस ब्रह्मचर्य में ब्रह्म ही समिधा, ब्रह्म ही अग्नि तथा ब्रह्म ही कुशस्तरण है | जल भी ब्रह्म है और गुरु भी ब्रह्म ही  है  – यही मेरा ब्रह्मचर्य है | विद्वान पुरुष इसी को सूक्ष्म ब्रह्मचर्य मानते हैं | माता ! अब मेरे गुरु का परिचय सुनो, जिन्होंने मुझे विद्या प्रदान की है | एक ही शिक्षक है, दूसरा कोई शिक्षक नहीं है | ह्रदय में विराजमान अन्तर्यामी पुरुष ही शिक्षक हो कर शिक्षा देता है | उसी से प्रेरित होकर मैं झरने से बह कर जाने वाले जल की भांति  जहाँ जिस कार्य में नियुक्त होता हूँ, वहां वैसा ही करता हूँ | एक ही गुरु है, उनके सिवा दूसरा कोई गुरु नहीं है | जो ह्रदय में विराजमान हैं, वे गुरु हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ | उन्ही गुरुस्वरूप भगवान् मुकुंद की अवहेलना करके सम्पूर्ण दानव पराभव को प्राप्त हुए हैं | एक ही बंधू है, उसके सिवा दूसरा बंधू नहीं है | जो ह्रदय में विराजमान है, वह परमात्मा ही बंधू है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ | उसी से शिक्षा प्राप्त करके सात बंधुमान भाई सप्तर्षि आकाश में प्रकाशित होते हैं | ऐसे ही ब्रह्मचर्य का भलीभांति सेवन करना चाहिए | अब मेरा गृहस्थ कैसा है, यह भी सुन लो | माता जी ! प्रकृति ही मेरी पत्नी है, किन्तु मैं कभी उसका चिंतन नहीं करता; वही सदा मेरा चिंतन किया करती है | वह मेरे सब प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली है | नासिक, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान, मन और बुद्धि – यह सात प्रकार की अग्नि सदा मेरी अग्निशाला में प्रज्ज्वलित रहती है | गंध, रस, रूप, शब्द, स्पर्श, मंतव्य और बोधव्य – ये ही सात मेरी समिधाएँ हैं | होता भी नारायण है और ध्यान से साक्षात् नारायण ही उपस्थित हो उस हविष्य का उपयोग करते हैं | ऐसे महायज्ञ द्वारा मैं अपनी इस ग्रहस्ती में उन परमेश्वर विष्णु का यजन करता हूँ | किसी भी वस्तु की कामना नहीं रखता, यथापि मेरे सम्पूर्ण काम स्वयं सिद्ध हैं | मैं सांसारिक सम्पूर्ण दोषों से द्वेष नहीं करता, तथापि कोई भी दोष मुझमें प्रकट नहीं होता ! जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूँद का लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरा स्वभाव राग-द्वेष आदि से लिप्त नहीं होता | मैं नित्य हूँ, बभुतों के स्वभाव का साक्षी हूँ, अनित्य भोग मुझ पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते | जैसे सूर्य की किरणें आकाश में लिप्त नहीं होती, वैसे ही मेरे भगवदर्थ किये गए निष्काम कर्मों में भोग समूह लिप्त नहीं होता, (मेरे कर्मों का फल भोग सामग्री के रूप में नहीं उपस्थित होता, वे कर्म तो भगवत्प्राप्ति कराने वाले हैं  ) | माता ! ऐसे मुझ पुत्र से तुम दुखी न हो | मैं तुम्हें उस पद पर पहुचा दूंगा, जहाँ सैकड़ों यज्ञ करके भी पहुचना असम्भव है |
अपने पुत्र की यह बात सुनकर इतरा को बड़ा विस्मय हुआ | वह सोचने लगी, ‘ अहो ! यदि मेरा पुत्र ऐसा दृणनिश्चय वाला विद्वान है, तब तो संसार में जब इसकी ख्यति  होगी, उस समय मेरा भी महान यश फैलेगा |’ माता इस प्रकार की बातें सोच ही रही थी की शंख चक्र गदाधारी भगवान् विष्णु उस अर्चा विग्रह से साक्षात प्रकट हो गए | वे उस द्विजपुत्र की बातों से अत्यंत प्रसन्न थे | भगवान् को देखते ही ऐतरेय धरती पर दंड की भाँती गिर पड़े | उनके शरीर में रोमांच हो आया | नेत्रों से प्रेम के आंसू बहने लगे | वाणी गदगद हो गयी | बुद्धिमान ऐतरेय ने मस्तक पर अंजलि बाँध कर भगवान् का इस प्रकार स्तवन प्रारंभ किया –
‘आप भगवान् वासुदेव का हम ध्यान और नमस्कार करते हैं | आप ही प्रदुम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण हैं, आपको नमस्कार है | आप केवल विज्ञानरूप तथा परमानंद मूर्ती है, आपको नमस्कार है | आप आत्माराम, शांत तथा आप समस्त इन्द्रियों के स्वामी (हृषिकेश) हैं, सबसे महान तथा अनंत शक्तियों से संपन्न हैं; आपको नमस्कार है | मनसहित वाणी के थक कर निवृत हो जाने पर जो एक मात्र अपनी कृपा से ही सुलभ होने वाले हैं, नाम और रूप से रहित चैतन्यघन ही जिनका रूप है, वे सत और असत से परे विराजमान परमात्मा हम सबकी रक्षा करें | आप परम सत्य तथा निर्मल हैं, हम आपकी उपासना करते हैं | जो षड्विध ऐश्वर्य से युक्त परम पुरुष महानुभाव एवं समस्त महाविभूतियों के अधिपति हैं, उन भगवान् को नमस्कार है | परमेष्ठिन ! आप सबसे उत्कृष्ट हैं, सम्पूर्ण भक्त समुदाय आपके युगल चरणार्विन्दों की बड़े लाड प्यार से सेवा करते हैं | आपको नमस्कार है | अग्नि आपका मुख है, पृथ्वी आपके दोनों चरण है, आकाश मस्तक है, चन्द्रमा तथा सूर्य दोनों नेत्र हैं, सम्पूर्ण लोक आपका शरीर है तथा चारों दिशाएँ आपकी चार भुजाएं हैं | भगवान् ! आपको नमस्कार है | हे स्तुति करने योग्य परमात्मन ! हे नाथ ! इस पृथ्वी पर कोई भी ऐसा प्रदेश नहीं है, जिनमें मेरा जन्म न हुआ हो, जहाँ मेरी मृत्यु न हुई हो | मैं समझता हूँ, यदि मेरे माता पिताओं की गणना की जाए, तो यह विशाल पृथ्वी परमाणुओं की स्थिति में पहुच जाएगी – असंख्य जन्मों के मेरे माता पिताओं की गणना करने के लिए पृथ्वी के परमाणु बराबर टुकड़े करने पड़ेंगे | देवदेव ! मेरे जो मित्र, शत्रु, अनुजीवी तथा भाई बंधू इस संसार में हो गए हैं, उन सबको गणना करने में मैं सर्वथा असमर्थ हूँ | नाथ ! मैंने अपना मन बार बार आपके चरणों में समर्पित किया, परन्तु मेरा दुर्जय शत्रु काम अपने क्रोध आदि सहायकों द्वारा उसे हठात अपने वश में कर लेता है | भगवन ! अब आप ही बताइए, ऐसे दशा में मैं क्या करूँ ? सर्वव्यापी परमेश्वर ! मैं बहुत ही पीड़ित हूँ | संसाररुपी गड्ढे में गिरे हुए इस दीन पर आप दया कीजिये | दुर्गति में पड़ा हुआ प्राणी भी महात्माओं  की शरण में आ जाने पर कष्ट नहीं भोगता | रोगी मनुष्यों को शरण देने वाला वैद्य है, महासागरोंमें डूबे हुए मनुष्य का सहारा नौका है, बालक को आश्रय देने वाले माता और पिता हैं, परन्तु भगवन ! अत्यंत घोर संसार बंधन से दुखी हुए मनुष्य को शरण देने वाले केवल आप ही हैं | सर्वस्वरूप सर्वेश्वर ! प्रसन्न होइये, आप ही सबके कारण है | पारमार्थिक सारतत्व भी आप ही हैं | महान दुःख समूह से भरे हुए, संसाररुपी गड्ढे से स्वयं ही हाथ पकड़कर मुझे निकालिए | हे अच्युत ! हे उरुक्रम ! यह संसार भूख और प्यास से, वात, पित्त और कफ – इन तीन धातुओं से; सर्दी गर्मी, आंधी और वर्षा से, आपस में ही एक दूसरे से तथा कभी तृप्त न होने वाली कामाग्नि तथा क्रोधाग्नि से बारम्बार पीड़ित होता है | इसे इस दशा में देखकर मेरा मन बहुत ही दुखी हो रहा है | मैंने अपनी शक्ति के अनुसार सम्पूर्ण जगत को धारण करने वाले परमेश्वर भगवान् आप वासुदेव का स्तवन किया है | इस से सबका कल्याण हो, सम्पूर्ण जगत के समस्त दोष नष्ट हो जाएँ | आज मेरे द्वारा जगत्धाता वासुदेव की स्तुति हुई है; इससे इस पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में, स्वर्गलोक में तथा रसातल में भी जो कोई प्राणी रहते हों, वे सिद्धि को प्राप्त हो जाएँ | मेरे द्वारा स्तुति पाठ करे समय जो लोग इसको सुनते हों, इस स्तोत्र का उच्चारण करते समय जो मुझे देखते हैं, वे देवता, असुर, मनुष्य तथा पशु पक्षी कोई भी क्यों न हों, सभी भगवान् विष्णु के तत्वज्ञान को प्राप्त करें | इनके सिवा जो गूंगे तथा अन्यान्य इन्द्रियों से रहित हों, जो देख सुन न सकते हों, तथा पशु पक्षी, कीड़े मकोड़े आदि भी आज भाग्वातत्व ज्ञान के भागी हो जाएँ | संसार में दुखों का नाश हो जाए, समस्त प्रजा के ह्रदय में लोभ आदि दोषसमुदाय निकल जाए | अपने में, अपने भाई और पुत्र में जैसा प्रेम और आत्मीयता का भाव होता है, सब लोगों का सबके प्रति वैसा ही भाव हो जाए | जो संसाररुपी रोग के चिकित्सक, सम्पूर्ण दोषों के निवारण में चतुर तथा परमानन्द की प्राप्ति के हेतुभूत हैं, वे भगवान् विष्णु सबके ह्रदय में विराजमान हों और ऐसा होने से सब लोगों के संसार बंधन शिथिल हो जाएँ | सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाले भगवान् वासुदेव का समरण करने पर मन, वाणी और शरीर द्वारा आचरित मेरे समस्त पाप नष्ट हो जाएँ | हे वासुदेव ! ऐसा उच्चारण करने पर अथवा भगवान् विष्णु के भक्त की महिमा का कीर्तन करने पर, अथवा श्री हरी का स्मरण करने पर समस्त पापों का नाश हो जाता है | यदि यह सत्य है, तो इस सत्य के प्रभाव से मेरा पाप नष्ट हो जाए | अखिलेश्वर ! आपके चरणों में पड़े हुए मुझ सेवक पर आप यह सोच कर कृपा कीजिये की ‘ यह बेचारा मूढ़ है – कुछ जनता नहीं, इसकी बुद्धि बहुत थोड़ी है, इसके द्वारा उद्यम भी बहुत कम हो पाता है | विषयों से इसका मन सदा क्लेश में पड़ा रहता है, इसलिए यह मुझ में नहीं लग पाता |’ देव ! आपकी स्तुति करने में ब्रह्मा जी भी समर्थ नहीं हैं | भगवन ! आप प्रसन्न होइये | विष्णो ! आप बड़े दयालु हैं, मुझ अनाथ पर कृपा कीजिये | हे अनंत ! हे पापहारी हरि ! आप पुरुषोत्तम हैं, संसार सागर में डूबे हुए मुझ दीन का उद्धार कीजिये |
अर्जुन ! ऐतरेय के इस प्रकार स्तुति करने पर विशालकाय भगवान् वासुदेव ने आनंदमय होकर कहा – ” वत्स ऐतरेय ! मैं तुम्हारी भक्ति से और इस स्तुति से बहुत प्रसन्न हूँ | तुम मुझ से कोई मनोवांछित एवं दुर्लभ वर मांगो | ”
ऐतरेय ने कहा – नाथ ! हरे ! मेरा अभीष्ट वर तो यही है की घोर संसारसागर में डूबते हुए मुझ असहाय के लिए आप कर्णधार हों |
भगवान् वासुदेव बोले – वत्स ! तुम तो संसार सागर से मुक्त ही हो | जो सदा इस स्तोत्र से गुप्ताक्षेत्र में स्थित हुए मुझ वासुदेव का स्तवन करेगा, उसके सम्पूर्ण पापों का नाश हो जायेगा | अतः यह ‘अघनाशन’ नाम से विख्यात होगा | जो एकादशी को उपवास करके मेरे आगे इस स्तोत्र का पाठ करेगा, वह शुद्धचित्त होकर मेरे परम धाम को प्राप्त होगा | जैसे सब क्षेत्रों में मुझे यह गुप्तक्षेत्र अधिक प्रिय है, उसी प्रकार सब स्तोत्रों में यह स्तोत्र मुझे विशेष प्रिय है | जिन प्राणियों के उद्देश्य से महात्मा पुरुष इस स्तोत्र का जप करते हैं, वे सब प्राणी मेरी कृपा से शान्ति, ऐश्वर्य तथा उत्तम बुद्धि प्राप्त करेंगे | बेटा ! तुम श्रद्धापूर्वक वैदिक धर्मों का आचरण करो, उन्हें निष्कामभाव से मुझे समर्पित कर देने पर उनके द्वारा तुम्हें बंधन प्राप्त नहीं होगा | पत्नी का पाणिग्रहण करके तुम  यज्ञों द्वारा भगवान् की आराधना करो और अपनी माता की प्रसन्नता बढाओ | मुझमें तीव्र ध्यान करने से तुम निसंदेह मुझे ही प्राप्त होगे | बुद्धि, मन, अहंकार, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और पांच कर्मेन्द्रियाँ – ये तेरह ग्रह हैं | बोधव्य, मंतव्य, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, वचन, आदान, कर्म, गमन, मलोत्सर्ग और रतिजनित आनद – ये तेरह महाग्रह हैं | बेटा ! अपने बुद्धि  आदि  शुद्ध (आसक्तिशून्य) ग्रहों के द्वारा मेरा ध्यान करते हुए पूर्वोक्त महाग्रहों को शुद्ध रूप में ग्रहण करो, भागवतप्रसाद मानकर स्वीकार करो | ऐसा करने से तुम मोक्ष को प्राप्त होगे |
यों कह कर भगवान् विष्णु पुनः वासुदेव विग्रह में ही प्रवेश कर गए |

कलियुग का भविष्य कथन

राजन ! अट्ठाइसवें कलियुग में जो कुछ होने वाला है, उसे सुनो ! कलियुग के तीन हजार दो सौ नब्बे वर्ष व्यतीत होने पर इस भूमंडल में वीरों का अधिपति शूद्रक नामका राजा होगा, जो चर्चिता नगरी में आराधना करके सिद्धि प्राप्त करेगा | शूद्रक पृथ्वी का भार उतारने वाला राजा होगा | तदनन्तर कलियुग के तीन हजार तीन सौ दसवें वर्ष में नन्द वंश का राज्य होगा | चाणक्य नाम वाला ब्राह्मण उन नन्दवंशियों का संहार करेगा और शुक्ल तीर्थ में वह अपने समस्त पापों से छुटकारा पाने के लिए प्रायश्चित की अभिलाषा करेगा | इसके सिवा कलियुग के तीन हजार बीस बर्ष निकल जाने पर इस पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य होंगे | वे नवदुर्गाओं की सिद्धि एवं कृपा से राज्य पाएंगे और दीनों का उद्धार करेंगे | तदनन्तर तीन हजार से सौ वर्ष और अधिक बीतने पर शक नामक राजा होगा | उसके बाद कलियुग के तीन हजार छह सौ वर्ष बीतने पर मगध देश में हेमसदन से अञ्जनि के गर्भ से भगवान् विष्णु के अंशावतार स्वयं भगवान् बुद्ध प्रकट होंगे, जो धर्मं का पालन करेंगे | महात्मा बुद्ध के अनेक उत्तम चरित्र स्मरणीय होंगे | अपने भक्तों के लिए अपनी यशोगाथा छोड़कर वे स्वर्ग लोक को चले जायेंगे, भक्तजन उन्हें पापहारी बुद्ध कहेंगे | तत्पश्चात कलियुग के चार हजार चार सौ वर्ष बीत जाने पर चन्द्र वंश में महाराजा प्रमिति का प्रादुर्भाव होगा | वे बहुत बड़ी सेना के अधिपति तथा अत्यंत बलवान होंगे | करोडो म्लेछों का वध करके सब ओर से पाखण्ड का निवारण करते हुए केवल विशुद्ध वैदिक धर्म की स्थापना करेंगे | महाराजा प्रमिति का देहावसान गंगा यमुना के मध्यवर्ती क्षेत्र प्रयाग में होगा |
तत्पश्चात किसी समय काल के प्रभाव से जब प्रजा अत्यंत पीड़ित होने लगेगी, तब भयंकर अधर्म का आश्रय लेकर शठता पूर्वक बर्ताव करेगी | सभी अकर्मण्य तथा आवश्यक साधनों से भी रहित होंगे | उस समय शाल्य नामक म्लेछ धर्म का विनाश करने के लिए उन सबका संहार करेगा | उत्तम, मध्यम और अधम सब प्रकार की श्रेणियों का विनाश करके वह अत्यंत भयंकर कर्म करने वाला होगा | तब उसका वध करने के लिए सम्पूर्ण जगत के स्वामी साक्षात् भगवान् विष्णु  सम्भल ग्राम में श्रीविष्णुयशा के पुत्र हो कर अवतीर्ण होंगे और श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ जाकर उस ‘शाल्य’ नाम वाले म्लेछ का संहार करेंगे | वे सब ओर घूम घूम कर करोड़ों और अरबों पापियों का वध करके उस धर्म का पालन करेंगे, जो वेद मूलक है | साधु पुरुषों के लिए धर्मरूपी नौका का निर्माण करके अनेक प्रकार की लीलाएं करने के पश्चात वे भगवान् कल्कि परम धाम में पधारेंगे | राजन ! उसके बाद फिर सतयुग का आरम्भ होगा |  प्रथम सतयुग, अंतिम सतयुग और अट्ठाइसवें कलियुग ये अन्य युगों से कुछ विशिष्टता रखते हैं | शेष युगों की प्रवृत्ति औरों के सामान होती है | कलियुग बीतने पर सतयुग के प्रारंभ में राजा मरू (पुरु) से सूर्यवंश, देवापि से चन्द्रवंश और  श्रुतदेव से ब्राह्मण वंश की परम्परा चालू होगी | राजन ! इस प्रकार चरों युगों के व्यवस्था बदलती रहती हैं | चारों युगों में वही लोग धन्य हैं, जो भगवान् शंकर और विष्णु  का भजन करते हैं |

कलियुग की प्रवृत्ति का वर्णन

कलेर्दोषेनिवेश्चैव शृणु चैकं महागुणं |
यदल्पेन तु कालेन सिद्धि गच्छति मानवाः || (1)
त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः |
यथा क्लेशं वरन प्राश्स्तहा प्राप्यते कलौ ||  (2)
दुगत्रयेण तावन्तः सिद्धि गच्छन्ति पार्थिव |
यावन्तः सिद्धिमाद्यन्ति कलौ हरिहर्व्रताः || (3)
अब कलियुग की प्रवृत्ति सुनो | कलियुग में तमोगुण से व्याकुल इन्द्रियों वाले मनुष्य माया, असूया (दोष दृष्टी) तथा तपस्वी महात्माओं की हत्या भी करते हैं | कलि में मन और इन्द्रियों को मथ डालने वाला राग प्रकट होता है | सदा भुखमरी का भय सताता रहता है, भयंकर अनावृष्टि का भय भी प्राप्त होता है | सब देशों में नाना प्रकार के उलट फेर होते रहते हैं | सदा अधर्म सेवन करने के कारण मनुष्यों के लिए वेद का प्रमाण मान्य नहीं रह जाता | प्रायः लोग अधार्मिक, अनाचारी, अत्यंत क्रोधी और तेजहीन होते हैं | लोभ के वशीभूत हो कर झूठ बोलते हैं, उनमें अधिकांश नारियों का सा स्वभाव आ जाता है, उनकी संतान दुष्ट होती हैं | ब्राह्मणों के दूषित यज्ञ, दोषयुक्त स्वाध्याय, दूषित आचरण तथा असत शास्त्रों के सेवन रूप कर्म दोष  से समस्त प्रजा का विनाश होता है | क्षत्रिय और ब्राह्मण नाश को प्राप्त होते हैं और वैश्य तथा शूद्रों की वृद्धि होती है | शूद्र लोग ब्राह्मणों के साथ एक  आसन पर सोते, बैठते और भोजन भी करते हैं | शूद्र ब्राह्मणों के आचरण अपनाते हैं और ब्राह्मण शूद्र के सामान आचरण करते हैं | चोर राजाओं की वृत्ति में स्थित होते हैं और राजा लोग चोर के सामान वर्ताव करते हैं |
पतिव्रता स्त्रियाँ कम होने लगती हैं और कुलटाओं की संख्या बढती है | कलियुग में भूमि प्रायः थोडा फल देने वाली होती है, कही कहीं वह अधिक उपजाऊ होती है | राजा लोग निडर होकर पाप करते हैं, वे रक्षक नहीं वरन प्रजा की संपत्ति हड़प लेने वाले होते हैं | कलियुग में प्रायः क्षत्रियेत्तर जाति के लोग राजा होते हैं | ब्राह्मण शूद्र की वृत्ति से जीविका चलने वाले होंगे | शूद्र ब्राह्मणों से अभिवन्दित हो कर स्वयं वाद-विवाद करने वाले होंगे | वे द्विजों को देख कर भी अपने आसन से उठ कर खड़े न होंगे | द्विजों के सामने भी शूद्र ऊँचे आसन पर बैठे रहेंगे; यह बात जानकार भी राजा उन्हें दंड नहीं देगा | देखो, काल का कैसा प्रभाव है | अल्प विद्या और अल्प भाग्य वाले ब्राह्मण सुन्दर सुन्दर फूलों तथा अन्य प्रकार के अलंकारों से शूद्रों की अर्चना किया करेंगे | कलियुग के ब्राह्मण पाखंडियों के न लेने योग्य दूषित दान को भी ग्रहण करते हैं और उसके कारण दुस्तर रौरव नरक में पड़ते हैं | करोड़ों द्विज कलिकाल में तप और यज्ञ का फल बेचने वाले तथा अन्यायी होते हैं |  मनुष्यों के संतानों में पुत्र थोड़े और कन्यायें अधिक होती हैं |
कलियुग में मनुष्य वेद वाक्यों तथा वेदार्थों की निंदा करते हैं | शूद्रों ने जिसे स्वयं रच लिया हो, वही शास्त्र एवं प्रमाण माना जायेगा | हिंसक जीव प्रबल होंगे और गौवंश का क्षय होगा | दान आदि कोई भी धर्म अपने शुद्ध रूप में नहीं पालित होगा | साधू पुरुषों का अनेक प्रकार से विनाश होगा  | राजा लोग प्रजा के रक्षक न होंगे | कलियुग का अंतिम भाग उपस्थित होने पर प्रत्येक जनपद के लोग अन्न का व्यापार करेंगे, ब्राह्मण वेद बेचने वाले होंगे, स्त्रियाँ व्यभिचार से अर्थोपार्जन करेंगी | घरों में स्त्रियों की प्रधानता होगी | वे अपवित्र कपडे पहनने वाली तथा कर्कशा होंगी | बहुत अधिक भोजन में लिप्त हो कर कृत्या की भाँती प्रतीत होंगी | कलियुग में प्रायः सब लोग वाणिज्य वृत्ति करने वाले होंगे | इंद्र छिट-पुट वर्षा करने वाले होंगे | मनुष्य दुराचार सेवन आदि व्यर्थ के पाखंडों से घिरे होंगे और सब लोग एक दूसरे से याचना करेंगे | उस समय लोगों को पाप करने में तनिक भी शंका नहीं होगी | जब कलियुग के संहार का समय आएगा उस समय मनुष्य पराया धन हडपने वाले, परस्त्रियों का सतीत्व नष्ट करने वाले तथा पंद्रह वर्ष की आयु वाले होंगे | चोर के घर भी चोरी करने वाले तथा लुटेरे के घर में भी लूट मार करने वाले होंगे | ज्ञान और कर्म दोनों का अभाव हो जाने से सब लोग उद्यम करना छोड़ देंगे | उस समय कीड़े, चूहे और सर्प मनुष्य को डसेंगे |  वर्ण और आश्रम धर्म के विरोधी जो अन्य पाखण्ड सुने जाते हैं, वे सब उस समय प्रकट होंगे और उनकी वृद्धि होगी | कलियुग में स्त्री और पुत्र से दुःख, शरीर का संहार, सदा रोगी रहना तथा पाप करने में आग्रह रखना आदि दोष क्रमशः बढ़ते ही जायेंगे |
राजन ! यद्यपि कलियुग समस्त दोषों का भण्डार है, तथापि उसमें एक महान गुण भी है, उसे सुनो – कलिकाल में थोड़े ही समय साधन करने से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाते हैं | (1) सतयुग, त्रेता और द्वापर – इन तीनों युगों के लोग ऐसा कहते हैं कि जो मनुष्य कलियुग में श्रद्धा परायण होकर वेदों, स्मृतियों और पुराणों में बताये गए धर्म का अनुष्ठान करते हैं, वे धन्य हैं | त्रेता में एक वर्ष तक तथा द्वापर में एक मास तक क्लेशसहनपूर्वक धर्मानुष्ठान करने वाले बुद्दिमान पुरुष को जो फल प्राप्त होता है वह  कलियुग में एक दिन के अनुष्ठान  से मिल जाता है | राजन ! कलियुग में भगवान् विष्णु और शिव की नियमपूर्वक उपासना करने से जितने मनुष्य  सिद्धि को प्राप्त होते हैं, उतने अन्य युगों में तीन युगों में उपासना करने से प्राप्त होते हैं | 

श्राद्ध से पितरों की पूर्ती कैसे होती है ?

नारद जी कहते हैं – अर्जुन ! इसके बाद राजा करन्धम ने महाकाल से पूछा – भगवन ! मेरे मन में सदा ये संशय रहता है की मनुष्यों द्वारा पितरों का जो तर्पण किया जाता है, उसमें जल तो जल में ही चला जाता है; फिर हमारे पूर्वज उस से तृप्त कैसे होते हैं ? इसी प्रकार पिंड आदि का सब दान भी यहीं देखा जाता है | अतः हम यह कैसे कह सकते हैं की यह पितर आदि के उपभोग में आता है ?”
महाकाल ने कहा – राजन ! पितरों और देवताओं की योनि ही ऐसी होती है की वे दूर की कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा भी ग्रहण कर लेते हैं और दूर की स्तुति से भी संतुष्ट होते हैं | इसके सिवा ये भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते और सर्वत्र पहुचते हैं | पांच तन्मात्राएँ, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति – इन नौ तत्वों का बना हुआ उनका शरीर होता है | इसके भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं | इसलिए देवता और पितर गंध तथा रस तत्व से तृप्त होते हैं | शब्द तत्व से रहते हैं तथा स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं और किसी को पवित्र देख कर उनके मन में बड़ा संतोष होता है | जैसे पशुओं का भोजन तृण और मनुष्यों का भोजन अन्न कहलाता है, वैसे ही देवयोनियों का भोजन अन्न का सार तत्व है | सम्पूर्ण देवताओं की शक्तियां अचिन्त्य एवं ज्ञानगम्य हैं | अतः वे अन्न और जल का सार तत्व ही ग्रहण करते हैं, शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं स्थित देखी जाती है |
करन्धम ने पूछा – श्राद्ध का अन्न तो पितरों को दिया जाता है, परन्तु वे अपने कर्म के अधीन होते हैं | यदि वे स्वर्ग अथवा नर्क में हों, तो श्राद्ध का उपभोग कैसे कर सकते हैं ? और वैसी दशा में वरदान देने में भी कैसे समर्थ हो सकते हैं ?
महाकाल ने कहा – नृपश्रेष्ठ ! यह सत्य है की पितर अपने अपने कर्मों के अधीन होते हैं, परन्तु देवता, असुर और यक्ष आदि के तीन अमूर्त तथा चार वर्णों के चार मूर्त – ये सात प्रकार के पितर माने गए हैं | ये नित्य पितर हैं, ये कर्मों के अधीन नहीं, ये सबको सब कुछ देने में समर्थ हैं | वे सातों पितर भी सब वरदान आदि देते हैं | उनके अधीन अत्यंत प्रबल इकतीस गण होते हैं | राजन ! इस लोक में किया हुआ श्राद्ध उन्ही मानव पितरों को तृप्त करता है | वे तृप्त होकर श्राद्धकर्ता के पूर्वजों को जहाँ कहीं भी उनकी स्थिति हो, जाकर तृप्त करते हैं | इस प्रकार अपने पितरों के पास श्राद्ध में दी हुई वस्तु पहुचती है और वे श्राद्ध ग्रहण करने वाले नित्य पितर ही श्राद्ध कर्ताओं को श्रेष्ठ वरदान देते हैं |
राजा ने पूछा – विप्रवर ! जैसे भूत आदि को उन्हीं के नाम से ‘इदं भूतादिभ्यः” कह कर कोई वस्तु दी जाती है, उसी प्रकार देवता आदि को संक्षेप में क्यों नहीं दिया जाता है ? मंत्र आदि के प्रयोग द्वारा विस्तार क्यों किया जाता है ?
महाकाल ने कहा – राजन ! सदा सबके लिए उचित प्रतिष्ठा करनी चाहिए | उचित प्रतिष्ठा के बिना दी हुई कोई वास्तु देवता आदि ग्रहण नहीं करते | घर के दरवाजे पर बैठा हुआ कुत्ता, जिस प्रकार ग्रास (फेंका हुआ टुकड़ा) ग्रहण करता है, क्या कोई श्रेष्ठ पुरुष भी उसी प्रकार ग्रहण करता है ? इसी प्रकार भूत आदि की भाँती देवता कभी अपना भाग ग्रहण नहीं करते | वे पवित्र भोगों का सेवन करने वाले तथा निर्मल हैं | अतः अश्रद्धालु पुरुष के द्वारा बिना मन्त्र के दिया हुआ जो कोई भी हव्य भाग होता है, उसे वे स्वीकार नहीं करते | यहाँ मन्त्रों के विषय में श्रुति भी इस प्रकार कहती है –
” सब मन्त्र ही देवता हैं, विद्वान पुरुष जो जो कार्य मन्त्र के साथ करता है, उसे वह देवताओं के द्वारा ही संपन्न करता है | मंत्रोच्चारणपूर्वक जो कुछ देता है, वह देवताओं द्वारा ही देता है | मन्त्रपूर्वक जो कुछ ग्रहण करता है, वह देवताओं द्वारा ही ग्रहण करता है | इसलिए मंत्रोच्चारण किये बिना मिला हुआ प्रतिग्रह न स्वीकार करे | बिना मन्त्र के जो कुछ किया जाता है , वह प्रतिष्ठित नहीं होता | “
इस कारण पौराणिक और वैदिक मन्त्रों द्वारा ही सदा दान करना चाहिए |
राजा ने पूछा – कुश, तिल, अक्षत और जल – इन सब को हाथ में लेकर क्यों दान दिया जाता है ? मैं इस कारण को जानना चाहता हूँ |
महाकाल ने कहा – राजन ! प्राचीन काल में मनुष्यों ने बहुत से दान किये, और उन सबको असुरों ने बलपूर्वक भीतर प्रवेश करके ग्रहण कर लिया | तब देवताओं और पितरों ने ब्रह्मा जी से कहा – स्वामिन ! हमारे देखते देखते दैत्यलोग सब दान ग्रहण कर लेते हैं | अतः आप उनसे हमारी रक्षा करें, नहीं तो हम नष्ट हो जायेंगे | ” तब ब्रह्मा जी ने सोच विचार कर दान की रक्षा के लिए एक उपाय निकल | पितरों को तिल के रूप में दान दिया जाए, देवताओं को अक्षत के साथ दिया जाए तथा जल और कुश का सम्बन्ध सर्वत्र रहे | ऐसा करने पर दैत्य उस दान को ग्रहण नहीं कर सकते | इन सबके बिना जो दान किया जाता है, उस पर दैत्य लोग बलपूर्वक अधिकार कर लेते हैं और देवता तथा पितर दुखपूर्वक उच्ह्वास लेते हुए लौट जाते हैं | वैसे दान से दाता को कोई फल नहीं मिलता | इसलिए सभी युगों में इसी प्रकार (तिल, अक्षत, कुश और जल के साथ) दान दिया जाता है |

भगवान् है या नहीं ?

बुद्धिश्च हायते पुंसां नाचैत्तगह समागमात |
मध्यस्थेमध्यताम याति श्रेष्ठताम याति चौत्तमे ||
नारद जी कहते हैं – नन्दभद्र नाम का एक वणिक था | धर्मों के विषय में जो कुछ कहा गया है, उसमें कोई भी ऐसी बात नहीं थी, जो नन्दभद्र को ज्ञात न हो | किसी के साथ उसका द्वेष नहीं था, न राग, न अनुरोध था, न विरोध था | पत्थर और सुवर्ण को समान समझते तथा अपनी निंदा और स्तुति में समान भाव रखते थे | वे स्वभाव से ही धीर थे | सम्पूर्ण भूतों से निर्भय रहते थे और अपनी आकृति ऐसी बनाए रखते थे, मानो अंधे और बहरे हों | कर्मों के फल की उन्हें कोई आकांक्षा नहीं थी अतः यह फल उनके लिए भगवान् सदाशिव की आराधना बन जाता था |
उनके मत से, प्रतिदिन अपनी शक्ति के अनुसार देवताओं, पितरों, मनुष्यों (अतिथि), ब्राह्मणों तथा पशु पक्षी, कीट-पतंगों के लिए अन्न देना चाहिए | सदा इन सब को अन्न देकर ही भोजन करना उचित है | उनके मत में जो धन और पद के मद में उन्मत्त होता है, वह पतित होकर विवेक खो बैठता है | अतः सम्पूर्ण भूतों को अपना स्वरुप मान कर उनके प्रति अपने ही जैसा बर्ताव करना चाहिए | जिसकी सर्वत्र आत्मदृष्टि है वह ऐश्वर्य से मतवाला नही हो सकता | इस प्रकार इधर उधर प्रकट हुए सारभूत सदाचार का संग्रह करके साधू शिरोमणि बुद्धिमान नन्दभद्र उसी का पालन करते थे |
इसी स्थान में एक शूद्र भी रहता था, जो नन्दभद्र का पडोसी था | उसका नाम तो था सत्यव्रत, किन्तु वह बड़ा भारी नास्तिक और दुराचारी था | धर्मपरायण नन्दभद्र पर बार बार दोषारोपण किया करता था और सदा उसके दोष ही ढूंढता रहता था | उसकी इच्छा थी, कि यदि इसका कोई छिद्र देख पाऊं तो उन्हें धर्म से गिरा दूं | खोटे ह्रदय वाले क्रूर नास्तिकों का यह स्वभाव ही होता है कि ये अपने को तो नीचा गिराते ही हैं, दूसरों को भी गिराने की चेष्टा करते हैं |
धार्मिक वृत्ति से रहने वाले बुद्धिमान नन्दभद्र के वृद्धावस्था में बड़े कष्ट से एक पुत्र हुआ, किन्तु वह चल बसा | इसे प्रारब्ध का फल मान कर उन महामति वैश्य ने शोक नहीं किया | देवता हो या मनुष्य प्रारब्ध विधान से कौन छूट सकता है | तदनंतर नन्दभद्र की प्यारी पत्नी कनका, जो बड़ी ही पतिव्रता और गृहस्थ धर्म की साक्षात् मूर्ती थी, सहसा मृत्यु को प्राप्त हो गयी | नन्दभद्र जितेन्द्रिय थे; फिर भी पत्नी के न रहने से गृहस्थ धर्म का नाश होगा, यह सोचकर उन्हें शोक हुआ |
नन्दभद्र का यह अंतर देख कर सत्यव्रत को बहुत दिनों के बाद बड़ी प्रसन्नता हुई | वह ‘हाय-हाय ! बड़े कष्ट की बात हुई’ ऐसा कहता हुआ शीघ्र ही नन्दभद्र के पास आया और मित्र की भाँती मिलकर उस से बोला – ‘ हा नन्दभद्र ! यदि तुम जैसे धर्मात्मा को भी ऐसा फल मिला तो इस से मेरे मन में यही आता है कि यह धर्म-कर्म व्यर्थ ही है | भाई नन्दभद्र ! मैं सदा तुमसे कुछ कहना चाहता था, किन्तु तुम्हारी ओर से कोई प्रस्ताव न होने के कारण मैंने कभी कुछ नहीं कहा, क्योंकि बिना किसी प्रस्ताव के बृहस्पति जी भी कोई बात कहें, तो उनकी बुद्धि की अवहेलना होती है और उन्हें नीच पुरुष की भाँती अपमान प्राप्त होता है | मैं वाणी के अठारह और बुद्धि कि नौ दोषों से रहित सर्वथा निर्दोष वाक्य बोलूँगा |
वाणी के अट्ठारह दोषों कर वर्णन सुनो | अपेतार्थ, अभिन्नार्थ, अप्रवृत्त, अधि, अश्लक्षण, संदिग्ध, पदांत अक्षर का गुरु होना, परांग्मुख-मुख, अनृत एवं असंस्कृत, त्रिवर्गविरुद्ध, न्यून, कष्ट्शब्द, अतिशब्द, ब्युत्क्र्माभिहृत, सशेष, अहेतुक तथा निष्कारण – ये वाणी के दोष हैं* | अब बुद्धि के दोष सुनो | काम, क्रोध, भय, लोभ, दैन्य, अनार्जव (कुटलिता) – इन छह दोषों से युक्त होकर तथा दया, सम्मान और धर्म – इन तीनो गुणों से हीन होकर मैं कोई बात न कहूँगा ( उक्त छह दोषों के साथ, दयाहीनता, सम्मानहीनता और धर्महीनता – ये तीन दोष और मिल जाने से नौ दोष होते हैं) | जब वक्ता, श्रोता और वाक्य तीनो अविकल रह कर बोलने की इच्छा में समान अवस्था को प्राप्त हों, तभी वक्ता का अभिप्राय यथावत रूप से प्रकट होता है | बातचीत करते समय जब वक्ता श्रोता की अवहेलना करता है अथवा श्रोता ही वक्ता की उपेक्षा करने लगता है, तब बोला हुआ वाक्य बुद्धि पर नहीं चढ़ता | इसके सिवा, जो सत्य का परित्याग करके अपने को अथवा श्रोता को प्रिय लगने वाला वचन बोलता है, उसके उस वाक्य में संदेह उत्पन्न होने लगता है, अतः वह वाक्य भी सदा सदोष ही है | इसलिए जो अपने को या श्रोता को प्रिय लगने वाली बात छोड़कर केवल सत्य ही बोलता है, वही इस पृथ्वी पर यथार्थ वक्ता है, दूसरा नहीं |
शास्त्रों के जाल से पृथक हो मिथ्यावाद को छोड़कर केवल सत्य कहना ही मेरा व्रत है इसलिए मैं ‘सत्यव्रत’ कहलाता हूँ | में तुमसे सही बात कहूँगा और तुम्हें भी उसे सत्य मान कर स्वीकार करना चाहिए |
भलेमानुस ! जबसे तुम पत्थर पूजने में लग गए, तब से तुम्हें कोई अच्छा फल मिला हो, ऐसा मैं नहीं देखता | तुम्हारे एक ही तो पुत्र था, वह भी नष्ट हो गया | पतिव्रता पत्नी थी, सो भी संसार से चल बसी | साधो ! झूठे तथा कपटपूर्ण कर्मों का ही ऐसा फल हुआ करता है | भैया ! देवता कहाँ हैं ? सब मिथ्या है ? यदि होते तो दिखाई न देते ? यह सब कुछ कपटी ब्राह्मणों की झूठी कल्पना है | लोग पितरों के उद्देश्य से दान देते हैं, यह देखकर मुझे तो हंसी आती है | मेरी दृष्टी में यह अन्न की बर्बादी है | भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खायेगा ? मूर्ख एवं नीच ब्राह्मण, जो समस्त संसार की दृष्टी का अनेक प्रकार से वर्णन किया करते हैं, उसमें भी जो यथार्थ बात है उसे सुनो | संसार सृष्टि और संहार – ये दोनों बातें झूठी हैं | वास्तव में यह जगत सत्य है और इसी रूप में सदा बना रहता है | यह विश्व स्वभाव से ही सदा वर्तमान रहता है, ये सूर्य आदि ग्रह स्वभाव से ही आकाश में विचरण करते हैं, स्वभाव से ही निरंतर वायु चलती है, स्वभाव से ही मेघ पानी बरसता है और स्वभाव से ही बोया हुआ धान्य जमता है | स्वभाव से ही पृथ्वी स्थिर है, स्वभाव से ही नदियाँ बहती हैं, स्वभाव से ही पर्वत अविचल भाव से सुशोभित हैं और स्वभाव से ही समुद्र अपनी मर्यादा में स्थित है | स्वभाव से ही गर्भवती स्त्री पुत्र पैदा करती है, स्वभाव से ही ये बहुतेरे जीव उत्पन्न होते हैं | जैसे स्वभाव से ही टेढ़े लोग होते हैं, ऋतु के प्रभाव से ही बेरों में कांटे पैदा होते हैं – इसी प्रकार स्वभाव से ही यह सम्पूर्ण जगत प्रकाशित होता है | इसका कोई प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला कर्ता नहीं है | इस प्रकार स्वभाव से ही सम्पूर्ण लोक स्थित है | ऐसी अवस्था में भी मूर्ख मनुष्य इस विषय को लेकर मतवाले की भाँती व्यर्थ मोह में पड़ा रहता है |
धूर्त लोग इस मनुष्य योनी को भी जो सबसे श्रेष्ठ बतलाते हैं, इसकी भी पोल खोलता हूँ, सुनो | मनुष्य योनी से बढ़कर दूसरी किसी योनी में कष्ट नहीं है | मनुष्यों को जो कष्ट हैं, वह हमारे शत्रुओं को भी न हो | मनुष्यों के समक्ष क्षण क्षण में शोक के सहस्त्रों स्थान आते हैं | यह मानव योनी क्या है, बंदीगृह है | कोई बडभागी पुरुष ही इस से छुटकारा पता है | ये पशु पक्षी, कीड़े-मकोड़े बिना किसी बंधन के सुख पूर्वक विहार करते हैं; इनकी योनि अत्यंत दुर्लभ है | ये स्थावर (वृक्ष-पर्वत आदि) कितने निश्चिन्त हैं | पृथ्वी पर इन्ही का सुख महान है | अधिक क्या कहें, मनुष्यों की अपेक्षा अन्य योनियों में उत्पन्न होने वाले सभी जीव धन्य हैं | कोई स्थावर है, कोई कीड़े हैं, कोई पतंग है और कोई मनुष्य आदि जीवों में उत्पन्न होने वाले सभी जीव धन्य हैं | इसमें स्वभाव ही प्रधान कारण समझो | पुण्य और पाप आदि तो कल्पनामात्र है | इसलिए नन्दभद्र ! तुम मिथ्याधर्म का परित्याग करके मौज से खाओ, पीओ, खेलो और भोग भोगो | पृथ्वी पर, बस यही सत्य है |
नारद जी ने कहा – सत्यव्रत के इन वाक्यों से, जो अशुभकर, अयुक्तिसंगत तथा असमंजस (दोषपूर्ण) थे, महाबुद्धिमान नन्दभद्र तनिक भी विचलित नहीं हुए | वे क्षोभरहित समुन्द्र के भांति गंभीर थे | उन्होंने हँसते हुए उत्तर दिया – ‘सत्यव्रत जी ! आपने जो यह कहा कि धर्मनिष्ठ मनुष्य सदा दुःख के भागी होते हैं, यह झूठ है | हम तो पापियों पर भी बहुतेरे दुःख आते देखते हैं | संसारबंधन जनित क्लेश तथा पुत्र और स्त्री आदि कि मृत्यु के दुःख पापी मनुष्यों के यहाँ भी देखे जाते हैं | इसलिए मेरे मत में धर्म ही श्रेष्ठ है | किसी पुण्यात्मा साधुपुरुष पर  संकट आया देखकर बड़े बड़े लोग सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए यह कहते हैं कि ‘अहो ! ये तो साधु पुरुष है, इन पर कष्ट आया, यह तो हमारे लिए बड़े दुःख कि बात है’ इत्यादि | पापियों को तो यह सहानुभूति भी दुर्लभ है | स्त्री तथा धन आदि के लोभ से जब कोई पापी लुटेरा घर में घुसता है, तो आप भी उस से डर जाते हैं; उसके प्रति द्वेष का परिचय देते हैं और उसके ऊपर क्रोध भी करते हैं | यह सब व्यर्थ ही तो है |
दूसरी बात जो आप यह कहते हैं कि इस संसार का कारण कोई महान ईश्वर नहीं है, यह भी बच्चों की सी बात है | क्या प्रजा बिना राजा के रह सकती है ? इसके सिवा जो आप यह कहते हैं कि तुम झूठे ही पत्थर के लिंग कि पूजा करते हो, इसके उत्तर में मुझे इतना ही निवेदन करना है कि आप शिवलिंग की महिमा को नहीं जानते हैं | ठीक उसी तरह, जैसे अँधा सूर्य के स्वरुप को नहीं जानता | ब्रह्मा आदि समस्त देवता, बड़े बड़े समृद्धिशाली राजा, साधारण मनुष्य तथा मुनि भी शिवलिंग कि पूजा करते हैं | उनके द्वारा स्थापित किये हुए शिवलिंग उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध हैं, क्या ये सब के सब मूर्ख ही थे और अकेले आप सत्यव्रत ही बुद्धिमानी का ठेका लिए बैठा है ? भगवान् विष्णु (राम) ने युद्ध में रावण को मार कर समुन्द्र के किनारे रामेश्वर लिंग की स्थापना की है, क्या वह झूठा ही है ? प्राचीन काल में इंद्र ने वृत्तासुर का वध करके महेंद्र पर्वत पर शिवलिंग को स्थापित किया, जिससे वृत्तवध के पाप से मुक्त होकर इंद्र आज भी स्वर्गलोक का आनंद भोगते हैं ! चंद्रमा ने पश्चिम समुन्द्र के तट पर प्रभास क्षेत्र में भगवान् सोमनाथ की स्थापना करके आरोग्यलाभ किया था | यमराज और कुबेर ने काशी में, गरुण और कश्यप ने सह्य पर्वत पर तथा वायु और वरुण ने नैमिषारण्य में शिवलिंग को स्थापित किया है | जिस से वे सदा आनंदमग्न रहते हैं |
आप जो यदि यह कहते हैं कि देवता नहीं है और यदि हैं तो कहीं भी दिखाई क्यों नहीं देते ? आपके इस प्रश्न से मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है | जैसे दरिद्र लोग द्वार द्वार जा कर कुलथी मांगते हैं, उसी प्रकार क्या देवता भी आपके पास आकर याचना करें ? भैया ! आप बड़े बुद्धिमान हैं, आप जो चाहते हैं उसकी सिद्धि तो आपके गुरु ही कर सकते हैं | यदि आपके मत में सब पदार्थ स्वभाव से ही सिद्ध होते हैं, तो बताइये, कर्ता  के बिना भोजन क्यों नहीं तैयार हो जाता ? इसलिए जो भी निर्माण कार्य है, वह अवश्य किसी न किसी कर्ता का ही है | जिस पदार्थ में जितनी निर्माण शक्ति विधाता ने भर दी है, वह वैसा ही है |और आपने जो यह कहा है कि पशु आदि प्राणी ही सुखी तथा धन्य हैं, यह बात आपके सिवा और किसी ने न तो कही है और न सुनी ही है | तमोगुणी और अनेक इन्द्रियों से रहित जो पशु पक्षी आदि प्राणी है तथा उनके जो कष्ट हैं, वे भी यदि स्प्रुह्नीय और धन्य हैं तो सम्पूर्ण इन्द्रियों से युक्त मनुष्य श्रेष्ठ और धन्य क्यों नहीं है ? मैं तो समझता हूँ कि आपका जो यह अद्भुत सत्यव्रत है, इसे आपने नरक जाने के लिए ही संग्रह किया है | आपने पहले ही जो आडम्बरपूर्ण भूमिका बाँध कर अपने ज्ञान का परिचय देना आरम्भ किया है, उसी में आपके इन वचनों की सारहीनता व्यक्त हो गई है |
आपने प्रतिज्ञा तो की थी कुछ और कहने के लिए, परन्तु कह डाला कुछ और ही | इसमें आपका कोई दोष नहीं है, सब दोष मेरा ही है, जो मैं आपकी बात सुनता हूँ | नास्तिक, सर्प और विष इनका तो यह गुण ही है कि ये दूसरे को मोहित करते हैं | प्रतिदिन साधुपुरुषों का संग करना धर्म का कारण है | इसलिए विद्वान्, वृद्ध, शुद्ध भाव वाले तपस्वी तथा शान्तिपरायण संत महात्माओं के साथ संपर्क स्थापित करना चाहिए | दुष्ट पुरुषों के दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप, एक आसन पर बैठने तथा एक साथ भोजन करने से धार्मिक आचार नष्ट होते हैं | नीचों के संग से पुरुषों की बुद्धि नष्ट होती है, माध्यम श्रेणी के लोगों के साथ उठने बैठने से बुद्धि मध्यम स्थिति को प्राप्त होती है और श्रेष्ठ पुरुषों के साथ समागम होने से बुद्धि श्रेष्ठ हो जाती है | इस धर्म का स्मरण करके मैं पुनः आपसे मिलने की इच्छा नहीं रखता, क्योंकि आप सदा ब्राह्मणों की ही निंदा करते हैं |वेद प्रमाण है, स्मृतियों प्रमाण है तथा धर्म और अर्थ से युक्त वचन प्रमाण है, परन्तु जिसकी दृष्टी में ये तीनो ही प्रमाण नहीं है, उसकी बात को कौन प्रमाण मानेगा |
महात्मा नन्दभद्र सत्यव्रत से ऐसा कह कर उसी समय सहसा घर से निकल पड़े और भगवान् भट्टादित्य के परम पावन बहूदक तीर्थ में जा पहुचे |

शास्त्र ज्ञान

नारद जी के दुसरे से पंचम प्रश्न का उत्तर

2. कौन द्विज पचीस वस्तुओं के बने हुए गृह को अच्छी तरह जानता है ?
अब पच्चीस वस्तुओं से बने हुए गृह सम्बन्धी द्वितीय प्रश्न का उत्तर सुनिये । पांच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश), पांच कर्मेन्द्रिय (वाक्, हाथ, पैर, गुदा और लिंग), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (कान, नेत्र, रसना, नासिक और त्वचा), पाँच विषय – शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श तथा  मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष – ये पच्चीस तत्व हैं । पच्चीसवां तत्व पुरुष है जो सदशिवस्वरुप है । इन पच्चीस तत्वों से संपन्न हुआ यह शरीर ही घर कहलाता है । जो इस शरीर को इस प्रकार तत्वतः जानता है, वह कल्याणमय परमात्मा को प्राप्त होता है ।
3. अनेक रूप वाली स्त्री को एक रूप वाली बनाने की कला किसको ज्ञात है ?
वेदान्तवादी विद्वान बुद्धि को ही अनेक रूपों वाली स्त्री कहते हैं, क्योंकि यही नाना प्रकार के विषयों अथवा पदार्थों का सेवन करने से अनेक रूप ग्रहण करती है । किन्तु अनेकरूपा होने पर भी वह एकमात्र धर्म के संयोग से एक रूपा ही रहती है । जो इस तत्वार्थ को जानता है, वह (धर्म का आश्रय लेने के कारण) कभी नरक में नहीं पड़ता ।
4. संसार में रहने वाला कौन पुरुष विचित्र कथावाली वाक्यरचना को जानता है ?
मुनियों ने जिसे नहीं कहा है तथा जो वचन देवताओं की मान्यता नहीं स्वीकार करता, उसे विद्वानों ने विचित्र कथा से मुक्त बन्ध (वाक्य विन्यास) कहा है तथा जो काम युक्त वचन है वह भी इसी श्रेणी में हैं । (ऐसा वचन सुनने और मानने योग्य नहीं हैं । वास्तव में वह बंधन ही है ।
5. कौन स्वाध्यायशील ब्राह्मण समुन्द्र में रहने वाले महान ग्राह की जानकारी रखता है ?
अब पांचवे प्रश्न का समाधान सुनिये । एक मात्र लोभ ही इस संसार समुन्द्र के भीतर महान ग्राह है । लोभ से पाप में प्रवृति होती है, लोभ से क्रोध प्रकट होता है, लोभ से कामना होती है, लोभ से ही मोह, माया (शठता), अभिमान, स्तम्भ (जड़ता), दुसरे के धन की स्पृहा, अविद्या और मूर्खता होती है । यह सब कुछ लोभ से ही उत्पन्न होता है । दूसरे के धन का अपहरण, पराई स्त्री के साथ बलात्कार, सब प्रकार के दुस्साहस में प्रवृत्ति तथा न करने योग्य कार्यों का अनुष्ठान भी लोभ की ही प्रेरणा से होता है । अपने मन को जीतने वाले संयमी पुरुष को उचित है की वह उस लोभ को मोह्सहित जीते । जो लोभी और अजितात्मा है, उन्ही में दंभ, द्रोह,  निंदा, चुगली और दूसरों से डाह – यस सब दुर्गुण प्रकट होते हैं । जो बड़े बड़े शास्त्रों को याद रखते हैं और दूसरों की शंकाओं का निवारण करते हैं, ऐसे बहुज्ञ विद्वान भी लोभ के वशीभूत होकर नीचे गिर जाते हैं । लोभ और क्रोध में आसक्त मनुष्य सदाचार से दूर हो जाते हैं । उनका अंतःकरण छुरे  के समान तीखा होता है । परन्तु ऊपर से वे मीठी बातें करते हैं । ऐसे लोग तिनकों से ढके हुए कुँए के सामान भयंकर होते हैं । वे ही लोग केवल युक्तिवाद का सहारा लेकर अनेकों पंथ चलाते हैं । लोभवश मनुष्य समस्त धर्म मार्गों का लोप कर देते हैं । लोभ से ही कुटुम्बी जनों के प्रति निष्ठुरता पूर्वक वर्ताव करते हैं । कितने ही नीच मनुष्य लोभवश धर्म को अपना वाह्य आभूषण बना धर्मज्ञ होकर जगत को लूटते हैं । वे सदा लोभ में डूबे रहने वाले महान पापी हैं । राजा जनक, वृषादर्भी, प्रसेनजित तथा और भी बहुत से राजा लोभ का नाश करके स्वर्गलोक में गए हैं । इसलिए जो लोग लोभ का परित्याग करते हैं, वे ही इस संसार समुन्द्र के पार जाते हैं । इनसे भिन्न लोभी मनुष्य ग्राह के चंगुल में ही फंसे हुए हैं । इसमें संशय नहीं है ।